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हाईकोर्ट ने कहा, चश्मदीद गवाहों का बयान किसी भी मेडिकल राय या एफआईआर की छोटी कमियों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण
प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मिर्जापुर के चुनार इलाके में वर्ष 1983 के चर्चित मंगला सिंह हत्याकांड मामले में दो भाइयों की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाहों का सुसंगत और विश्वसनीय बयान किसी भी मेडिकल राय या एफआईआर की छोटी-मोटी कमियों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने कालिदास और छोटेलाल की अपीलों को खारिज करते हुए दिया है। घटना 26 जुलाई 1983 को मिर्जापुर जिले के चुनार थाना क्षेत्र के ममोलपुर गांव की है। घटना की पृष्ठभूमि एक साल पुरानी थी, जब मंगला सिंह के खेत में आरोपी के पिता की बकरी घुस गई थी और मंगला सिंह ने उसे लाठी से मार दिया था, जिससे उसका पैर टूट गया था। इस बात को लेकर दोनों पक्षों में रंजिश चली आ रही थी।
घटना के दिन जब मंगला सिंह नहर के पुल पर बैठे थे, तभी गुलाब दास के दो बेटे कालिदास और छोटेलाल वहां पहुंचे। छोटेलाल ने चिल्लाकर कालिदास को उकसाया कि अच्छा मौका मिला है, इसे जान से मार डालो। इस पर कालिदास ने मंगला सिंह के सिर पर गड़ासे से जानलेवा हमला कर दिया और उसके गिरने पर दूसरा वार उसकी जांघ पर किया। इलाज के दौरान लगभग तीन महीने बाद अक्टूबर 1983 में मंगला सिंह की मृत्यु हो गई। वर्ष 1985 में अपर सत्र न्यायाधीश मिर्जापुर ने दोनों आरोपितों को हत्या का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ यह अपील की गई थी।
अपीलार्थी की ओर से तर्क दिया गया कि एफआईआर में कई महत्वपूर्ण विवरण (जैसे रंजिश की बात और कुछ गवाहों के नाम) शामिल नहीं थे। इस पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआईआर कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, बल्कि यह केवल घटना का सबसे पहला विवरण होती है। इसमें केवल घटना की व्यापक तस्वीर का होना जरूरी है, हर सूक्ष्म विवरण का होना आवश्यक नहीं। एफआईआर घटना की एनसाइक्लोपीडिया नहीं होती है।
अपीलार्थियों का तर्क था कि गवाहों ने गड़ासे से दो वार (सिर और जांघ पर) किए जाने की बात कही जबकि मेडिकल रिपोर्ट में जांघ पर केवल रगड़ की चोट पाई गई, जो किसी कुंद वस्तु से लग सकती है। इस विरोधाभास को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि चश्मदीद गवाहों का बयान विश्वसनीय और भरोसा करने योग्य है, तो केवल मेडिकल राय के आधार पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता। यह संभव है कि धोती की परतों या गड़ासे के पिछले हिस्से के टकराने के कारण जांघ पर गहरा घाव न बनकर केवल रगड़ आई हो। कोर्ट ने अपीलार्थी छोटेलाल की भूमिका पर भी मुहर लगाई, जिसने स्वयं हथियार नहीं चलाया था बल्कि अपने भाई को उकसाया था। कोर्ट ने कहा कि दोनों भाई एक ही साझा इरादे के साथ वहां पहुंचे थे, इसलिए आईपीसी की धारा 34 के तहत छोटेलाल भी हत्या के लिए समान रूप से उत्तरदायी है।
कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष ने आरोपितों के खिलाफ आरोपों को बिना किसी उचित संदेह के साबित किया है। साथ ही दोनों की अपील खारिज करते हुए उनकी जमानत रद्द कर दी और उन्हें सजा काटने के लिए तुरंत सरेंडर करने का आदेश दिया। यह भी कहा कि वे छह सप्ताह के भीतर सरेंडर नहीं करते तो सीजेएम मिर्जापुर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजने की कार्रवाई सुनिश्चित करें।
हत्या में दो भाइयों की दोषसिद्धि और उम्रकैद बरकरार
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