Tuesday, June 16, 2026
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लोन भुगतान के बाद मकान के दस्तावेज जब्त नहीं रख सकता बैंक: हाईकोर्ट

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बेटी की शादी के लिए संसाधन जोड़ रही माँ के हक में फैसला सुनाते हुए बैंक ऑफ इंडिया में बंधक उसके मकान के बैनामा और अन्य दस्तावेजों को दो सप्ताह के अंदर सुपुर्द करने का आदेश दिया है।
याची की ओर से उसका पक्ष अधिवक्ताओं ने रखा और दलील दी कि याची ने वर्ष 2002 में गाजियाबाद में एक मकान खरीदकर नगर निगम में नामान्तरण करवा लिया था। 10 वर्ष तक रहने के पश्चात 2012 में बैंक ऑफ इंडिया ने नोटिस भेजकर बताया कि मकान की पूर्व मालकिन अपने बेटे के 5 लाख के लोन में गारंटर थी और मकान बंधक था। पूर्व मालकिन के बेटे द्वारा लंबे समय से लोन न चुकाने से अब देनदारी 22 लाख रुपये से ऊपर है और न चुकाने की स्थिति में बैंक द्वारा मकान का कब्जा ले लिया जाएगा।
अधिवक्ताओं ने बताया कि तत्कालीन बैंक मैनेजर द्वारा भी ये माना गया कि न तो अब गारंटर ही जीवित है और न ही उसके बेटे की कोई जानकारी है। बैंक द्वारा याची के साथ समझौता करते हुए 5,50,000 रुपए जमा करवाकर अदेय प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया गया। किंतु गिरवी मूल दस्तावेज देने से ये कहकर इनकार कर दिया गया कि बैंक द्वारा मूल उधारकर्ता अथवा गारंटर को ही उक्त कागज लौटाए जा सकते हैं।
याची की ओर से तर्क दिया गया कि बैंक का आचरण मनमाना और अन्यायपूर्ण है। बैंक के अधिवक्ता ने दलील दी कि याची बैंक का न ग्राहक है और न ही उधारकर्ता, इसलिए उसका गिरवी दस्तावेजों पर कोई अधिकार नहीं है।
न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने कहा कि याची की सम्पत्ति खरीद और नामांतरण पर बैंक द्वारा कोई आपत्ति कभी नहीं की गई और न ही उक्त सम्पत्ति पर कोई सिविल अथवा आपराधिक मामला लम्बित है। बैंक मानता है कि मूल गारंटर और उसके बेटे से सम्पर्क अब संभव नहीं है एवं समस्त लोन राशि समझौते के आधार पर चुका दी गई है।
इसलिए अब बैंक के पास उक्त सम्पत्ति के गिरवी दस्तावेजों को रखने का कोई अधिकार नहीं है। याची अपनी बेटी की शादी हेतु दस्तावेजों के अभाव में लोन भी नहीं ले पा रही है। कोर्ट ने बैक को दो हफ्ते में भवन के दस्तावेज अदेयता प्रमाणपत्र के आधार पर रिलीज करने का निर्देश दिया है।

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