प्रयागराज, 13 जनवरी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने परिवार अदालत द्वारा पत्नी के पक्ष में दिये गये भरण-पोषण भत्ते में की गई वृद्धि को उचित ठहराते हुए पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने सुरेश चंद्र की पुनरीक्षण याचिका पर दिया है। अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, शाहजहांपुर द्वारा 26 जुलाई 2024 को धारा 127 के तहत पत्नी को दिए जाने वाले भरण-पोषण भत्ते को 500 रुपये प्रतिमाह से बढ़ाकर 3000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया था। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
दलील दी गई कि वह एक मजदूर है और सीमित आय में कठिनाई से जीवन यापन करता है। और भरण-पोषण राशि छठी बार बढ़ायी गयी है, जो अनुचित व उसकी आय क्षमता से अधिक है तथा निचली अदालत ने तथ्यों पर समुचित विचार नहीं किया। सरकारी अधिवक्ता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में 3000 रुपये प्रतिमाह की राशि न तो अधिक है और न ही पति की आय से परे है।
कोर्ट ने कहा कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का कानूनी और नैतिक दायित्व है। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि पति मजदूर भी है तो वह प्रतिदिन लगभग 600 रुपये कमा सकता है, जिससे उसकी मासिक आय करीब 18 हजार रुपये होती है। कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण राशि पति की आय के लगभग 25 प्रतिशत तक हो सकती है और याचिका खारिज कर दी।
मजदूर की पत्नी को तीन हजार प्रतिमाह गुजारा भत्ता आदेश के खिलाफ पति की याचिका खारिज
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