Tuesday, August 11, 2026
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बहुविकल्पीय प्रश्नों से विद्यार्थियों की लेखन क्षमता व अभिव्यक्ति में पड़ा रहा असर : डॉ गौरव

लखनऊ। भारत सरकार की नई शिक्षा नीति पर अब सवाल उठने शुरू हो गए हैं। नई परीक्षा प्रणाली से छात्रों की लेखन क्षमता एवं उनकी अभिव्यक्ति की क्षमता पर भारी असर पड़ रहा है। यह बातें कुशीनगर पीजी कॉलेज के प्रवक्ता डॉ.गौरव तिवारी ने हिन्दुस्थान समाचार से एक विशेष बातचीत में कही।

उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की ओर से नैक से ‘ए प्लस प्लस’ ग्रेड प्राप्त करने के बाद सत्र 2021-22 से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू किया गया। इसके तहत सभी स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों को सेमेस्टर प्रणाली में परिवर्तित कर दिया गया। साथ ही बीए, बीएससी और बीकॉम की परीक्षाएं पूरी तरह बहुविकल्पीय प्रश्न पद्धति से आयोजित की जा रही है। इस नई परीक्षा प्रणाली में भाषा विषयों (हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू) के विद्यार्थियों को बिना किसी वर्णनात्मक उत्तर लिखे ही उत्तीर्ण होने का अवसर मिल रहा है। इससे उनकी लेखन क्षमता और अभिव्यक्ति कौशल का परीक्षण नहीं हो पा रहा है।

उन्होंने विज्ञान वर्ग के विद्यार्थियों के संदर्भ में भी चिंता जताते हुए कहा कि बीएससी के छात्र बिना चित्रांकन, व्याख्या या जटिल प्रश्नों के चरणबद्ध समाधान के ही परीक्षा उत्तीर्ण कर रहे हैं। इससे उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता और व्यावहारिक समझ पर असर पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि गोरखपुर विश्वविद्यालय, जो ज्ञान, विज्ञान और राजनीति के क्षेत्र में एक प्रमुख केंद्र माना जाता है, वहां इस मुद्दे पर व्यापक चर्चा का अभाव भी चिंता का विषय बना हुआ है। शिक्षाविदों और विद्यार्थियों के एक वर्ग का मानना है कि पूरी स्नातक शिक्षा केवल बहुविकल्पीय प्रश्न आधारित परीक्षा से पूरी करना शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

बुद्ध पीजी कॉलेज कुशीनगर में प्रवक्ता डा. गौरव तिवारी ने इस व्यवस्था पर गहरी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय स्तर पर भाषा और साहित्य के विद्यार्थियों का बिना लिखित परीक्षा के उत्तीर्ण होना बेहद चिंताजनक है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे को उन्होंने विभिन्न मंचों पर उठाया, लेकिन इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त परीक्षा परिणामों में देरी भी विद्यार्थियों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। कई छात्रों को समय पर अंकपत्र की मूल प्रति नहीं मिल पा रही है और वे केवल ऑनलाइन कॉपी पर निर्भर हैं। अप्रैल 2025 में परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों को भी अप्रैल 2026 तक प्रमाणिक अंकपत्र मिलने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। समग्र रूप से देखा जाए तो समयबद्ध परीक्षा और प्रक्रिया को प्राथमिकता देने के बीच विद्यार्थियों की वास्तविक शैक्षणिक गुणवत्ता, लेखन क्षमता और कौशल विकास जैसे महत्वपूर्ण पहलू पीछे छूटते नजर आ रहे हैं।

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